स्वामी, मधु किश्वर, कपिल मिश्रा के आरोपों पर अदालत गये तो जोखिम सब स्पष्ट हो जाने का है

तारीख थी 29 मार्च 1998। लालू प्रसाद यादव मधेपुरा संसदीय सीट से 12 वीं लोकसभा का चुनाव जीतकर करीब सप्ताह भर पहले निचले सदन में पहुंच चुके थे और केवल दस दिन पहले, प्रधानमंत्री की शपथ ले चुके अटल बिहारी वाजपेयी के सामने थे। यह प्रधानमंत्री के तौर पर उनका दूसरा कार्यकाल था। वाजपेयी 16 मई 1996 को पहली बार प्रधानमंत्री बन चुके थे, गो उनका यह कार्यकाल केवल 13 दिन चला था और लोकसभा में विश्वास मत पर मतदान से ठीक पहले उन्होंने राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया था।

लालू प्रसाद यादव इससे पहले 1977 और 1989 में छपरा लोकसभा क्षेत्र से जीतकर निचले सदन में पहुंच चुके थे। यद्यपि लोकसभा सीटों के पुर्ननिर्धारण में 2008 में यह सीट सारण लोकसभा सीट हो गई थी। लेकिन साल भर बाद ही, 1990 में वह लोकसभा से इस्तीफा देकर बिहार के मुख्यमंत्री बन गए थे।

अलबत्ता सात साल बाद, चारा घोटाले में फंसा दिये जाने और अपने खिलाफ गिरफ्तारी का वारंट जारी होने के बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था और उनकी पत्नी राबड़ी देवी ने 25 जुलाई 1997 को पहली बार मुख्यमंत्री के रुप में शपथ ली थी। पर जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 सजायाफ्ता लोगों को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने का प्रावधान करता है, आरोपियों को नहीं। और चारा घोटाले में वारंट जारी होने पर भी, फिलवक्त उन पर भ्रष्ट आचरण के आरोप ही थे, लिहाजा उन्हें 12वीं लोकसभा का चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सका और मधेपुरा संसदीय क्षेत्र में शरद यादव को करीब 51 हजार वोटों से हराकर वह तीसरी बार लोकसभा में पहुंचे थे।

तो तारीख थी 29 मार्च 1998। नयी दिल्ली का लुटियंस इलाका ‘सहमत’ के उन पोस्टरों से भरा हुआ था, जिनमें अटल बिहारी वाजपेयी पर अपने गांव बटेश्वर में 1942 में प्रदर्शन और हिंसा की एक घटना में गोरखपुर की एक अदालत में ‘मुखबिर’ होने का आरोप लगाया गया था और कहते हैं कि वाजपेयी के लिखित वक्तव्य के कारण दो स्वतंत्रता सेनानियों को दस साल तक के कारावास की सजा सुना दी गई थी।

उस दिन ‘सहमत’ के उन पोस्टरों का उल्लेख करते हुए लोकसभा में जब यह आरोप लगाया गया, तब अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वीकार किया था कि 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अपने गांव बटेश्वर के उस प्रदर्शन में वह भीड़ में खड़े तो थे, पर उन्होंने किसी प्रदर्शन, सरकारी इमारतों या सम्पत्तियों पर किसी तोड़फोड़ में भाग नहीं लिया था।

वाजपेयी ने जोर देकर इस बात का खंडन किया था कि उन्होंने किसी की ‘मुखबरी’, किसी की ‘चुगली’ की, यद्यपि माना कि ग्वालियर की अदालत में एक वक्तव्य पर उनका हस्ताक्षर जरुर लिया गया था और वक्तव्य चूंकि उर्दू में था और तब वह उर्दू जानते नहीं थे, लिहाजा वक्तव्य में लिखी बात वह पढ भी नहीं सके। पर वाजपेयी के तई उनके इस हस्ताक्षरित वक्तव्य का इस्तेमाल किसी स्वतंत्रता सेनानी पर मुकद्दमा चलाने या उसे सजा देने में कतई नहीं किया गया।     

लालू प्रसाद यादव ने भी सदन में यह बात कही। इस पर लालकृष्ण आडवाणी ने कहा कि ‘यह आरोप बार—बार लगाया गया है। कोई आज की बात नहीं है। झूठ को बार—बार दोहराने से वह सच नहीं हो जाता।’ सदन में अटल जी के पीछे आडवाणी जी बैठे थे और उनके साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे मदनलाल खुराना, पीछे संतोष गंगवार।

इस पर लालू प्रसाद यादव ने कहा, ”हम अलेज नहीं कर रहे हैं, हम आपकी सहायता कर रहे हैं। … अगर यह झूठ है तो यह लिखनेवाले के हाथ में तत्काल हथकड़ी लगना चाहिए।” लालू प्रसाद यादव ने भरोसा जताया कि वाजपेयी ने कतई वह सब नहीं किया होगा, पर कहा कि ‘पोस्टर छपवाने वाले की हिम्मत देखिए कि पोस्टर का वितरक सहमत है और उनमें प्रकाशक और मुद्रक के नाम भी हैं।

लालू ने बगल में बैठे भजनलाल की ओर देखते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ‘सहमत’ पर और प्रकाशक, मुद्रक पर मानहानि के मुकद्दमे कर दें, अदालत में सब कुछ साफ हो जाएगा। 

अटल बिहारी वाजपेयी ने पोस्टर लगवाने वाली संस्था और प्रकाशक, मुद्रक के नाम स्पष्ट होने पर भी उन तीनों पर मानहानि के मुकद्दमे करने की कोई शपथ नहीं ली। उन्होंने कभी ऐसा किया भी नहीं। बल्कि उस दिन सदन में समाजवादी जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता चंद्रशेखर के कुछ कहने पर लालकृष्ण आडवाणी तुरंत ‘प्वाइंट आफ आर्डर’ उठाने लगे।

ठीक वैसे ही, जैसे खुद अपनी ही पार्टी के सुब्रमण्यम स्वामी, ‘मोदीनामा’ की विरुदावलि गा चुकीं मधुकिश्वर के खिलाफ साहब और उनके चाणक्य ने कभी कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। कपिल मिश्रा के खिलाफ भी नहीं, जिन्होंने 9 सितंबर 2016 को अपने मोबाइल से दिल्ली विधानसभा के माइक्रोफोन पर ‘स्नूपगेट कांड’ के वे ‘आडियों टेप्स’ तक बजा दिये थे।

कपिल मिश्रा तब विधानसभा में आम आदमी पार्टी के सदस्य थे, लेकिन अब खुद दिल्ली की भाजपा सरकार में मंत्री हें। अलबत्ता कपिल मिश्रा ने जो ‘आडियो टेप्स’ बजाए थे, उनका ताल्लुक केवल एक लड़की की जासूसी के बारे में था, पर सुब्रमण्यम स्वामी और मधुकिश्वर तो साहब के संबंध में कई ‘सेवाभावी स्त्रियों’ के नाम तक लेते रहे हैं।

जैसे आडवाणी के लिए ‘व्यवस्था का प्रश्न’ उठाने लगना असली मुद्दे से ध्यान हटाने की युक्ति थी, वैसे ही आज की भाजपा भी ‘सेवाभावी स्त्रियों’ के नाम लेने, उन्हें भूकम्प—ग्रस्त भुज में ठेके दिये जाने से लेकर मंत्री तक बनाए जाने पर हर वक्त मुद्दे से ध्यान हटाने की कोई—न—कोई युक्ति अपनाने लग जाती है, भले आरोप लगानेवालों के नाम, चाल, चेहरे कितने भी स्पष्ट हों।   

और खतरे क्या हैं?

अटल बिहारी वाजपेयी मानते थे कि अदालत गए नहीं कि सब कुछ साफ हो जाएगा। साहब और उनके चाणक्य का भी मत शायद यही हो कि इन तीनों के खिलाफ अदालती कार्रवाई शुरू की गई तो मामले की चर्चा तो होगी ही, सब कुछ स्पष्ट भी हो जाएगा। 

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